पश्चिम बंगाल की राजनीति 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सत्ता की स्थिरता, जनता के भीतर उभरती असंतुष्टि और विपक्ष की आक्रामक रणनीति—इन तीनों के बीच यह चुनाव एक बहुआयामी राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है।
राज्य में लगभग 7.5 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 49% है। पिछले चुनाव (2021) में मतदान प्रतिशत 82% से अधिक रहा था, जो इस बात का संकेत है कि बंगाल का मतदाता राजनीतिक रूप से अत्यंत जागरूक और सक्रिय है।
भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती घोटाले और प्रशासनिक विवादों से उपजा असंतोष जहां सत्तारूढ़ दल के लिए चुनौती बना हुआ है, वहीं विपक्ष इसे व्यापक जनसमर्थन में बदलने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने का चुनाव बन गया है।
1. तृणमूल कांग्रेस: कल्याणकारी मॉडल बनाम एंटी-इन्कम्बेंसी
तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक मॉडल मुख्य रूप से जनकल्याणकारी योजनाओं पर आधारित रहा है।
‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के तहत राज्य की 2.1 करोड़ से अधिक महिलाएं प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त कर रही हैं, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजनाओं में से एक बनाता है।
2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को लगभग 48% वोट शेयर मिला था, जिसमें महिलाओं का समर्थन निर्णायक रहा।
हालांकि, सत्ता के लंबे कार्यकाल के कारण एंटी-इन्कम्बेंसी एक स्वाभाविक चुनौती है।
शिक्षक भर्ती घोटाला, प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल और कुछ संवेदनशील घटनाओं ने विशेषकर शहरी क्षेत्रों में पार्टी की छवि को प्रभावित किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 3–5% वोट स्विंग चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में टीएमसी की रणनीति ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ को और सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
2. भाजपा: विस्तार से सत्ता तक की चुनौती
भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दशक में बंगाल की राजनीति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है।
2016 में पार्टी का वोट शेयर 10.16% था, जो 2021 में बढ़कर 38.1% हो गया—यह किसी भी राज्य में विपक्ष के लिए सबसे तेज़ उभारों में से एक माना जाता है।
भाजपा की ताकत उत्तर बंगाल की लगभग 50+ सीटों और जंगलमहल क्षेत्र में केंद्रित है।
पार्टी ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)’, घुसपैठ और पहचान की राजनीति जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है, खासकर मतुआ समुदाय की लगभग 30–35 सीटों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि, राज्य स्तर पर एक सशक्त स्थानीय नेतृत्व और मजबूत बूथ-स्तरीय संगठन की कमी अभी भी पार्टी के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
3. वाम-कांग्रेस गठबंधन: अस्तित्व से अवसर तक
2021 के चुनाव में शून्य सीटों पर सिमटने के बाद वाम-कांग्रेस गठबंधन के लिए 2026 का चुनाव निर्णायक है।
हाल के उपचुनावों और छात्र-युवा आंदोलनों के आधार पर यह संकेत मिल रहे हैं कि गठबंधन के वोट शेयर में 5–10% तक सुधार की संभावना है।
यदि यह गठबंधन 15%+ वोट शेयर हासिल करने में सफल रहता है, तो यह चुनाव को त्रिकोणीय बनाकर सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां एंटी-बीजेपी वोट विभाजित हो सकते हैं।
निर्णायक रणक्षेत्र: पांच क्षेत्र, पांच समीकरण
बंगाल की सत्ता का रास्ता पांच प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों से होकर गुजरता है:
मतुआ बेल्ट (नदिया, उत्तर 24 परगना | 35 सीटें):
नागरिकता (CAA) बनाम आर्थिक सुरक्षा (कल्याणकारी योजनाएं)
अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र (मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर | 50–66% आबादी):
वोटों का ध्रुवीकरण या विभाजन परिणाम तय करेगा
जंगलमहल (झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा | 40 सीटें):
आदिवासी अस्मिता, ST दर्जा और विकास
उत्तर बंगाल (दार्जिलिंग, कूचबिहार | 50 सीटें):
क्षेत्रीय पहचान, गोरखालैंड और सीमावर्ती राजनीति
औद्योगिक बेल्ट (हुगली, हावड़ा | 60 सीटें):
रोजगार, शिक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दे
निष्कर्ष: बदलता मतदाता, बदलता जनादेश
बंगाल का मतदाता अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक और परिणाम-आधारित निर्णय लेने वाला बन चुका है।
एक ओर कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक प्रभाव है, तो दूसरी ओर सुशासन, पारदर्शिता और रोजगार की मांग तेज होती जा रही है।
2026 का जनादेश इस बात का संकेत देगा कि क्या मतदाता स्थिरता को प्राथमिकता देता है या परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
निस्संदेह, यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि बंगाल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक चुनाव होगा।
राकेश मिश्रा
स्वतंत्र पत्रकार
