8.15 लाख करोड़ का कर्ज और कल्याणकारी योजनाओं की भरमार; क्या 'नवान्न' के पास है इस वित्तीय चक्रव्यूह से निकलने का कोई रास्ता?
क्या बंगाल की जनता को दी जा रही 'मासिक सहायता' राज्य के औद्योगिक भविष्य की भारी कीमत पर मिल रही है?
2011 से 2026 के बीच चार गुना बढ़ा कर्ज आखिर बंगाल की अगली पीढ़ी के लिए कौन सी पटकथा लिख रहा है? पश्चिम बंगाल इस समय एक ऐसे गंभीर आर्थिक दोराहे पर खड़ा है, जहाँ एक तरफ ममता सरकार की 95 से अधिक जनहितकारी योजनाएं करोड़ों लोगों के लिए सहारा बनी हैं, तो दूसरी तरफ राज्य का कुल ऋण 8.15 लाख करोड़ रुपये के पार पहुँचने का अनुमान है। वित्त विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या बंगाल 'समावेशी विकास' की आड़ में 'राजकोषीय आपदा' (Fiscal Disaster) की ओर बढ़ रहा है?
*सामाजिक सुरक्षा बनाम बुनियादी विकास का असंतुलन*
आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कुल राजस्व का 20% से अधिक हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज और मूलधन चुकाने में खर्च हो रहा है। सालाना लगभग 35,000 से 40,000 करोड़ रुपये ब्याज की भेंट चढ़ जाने के कारण नए उद्योगों, बेहतर सड़कों और आधुनिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए धन की भारी कमी हो गई है। जब किसी राज्य का बजट मुख्य रूप से 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) पर आधारित हो जाता है, तो वहां दीर्घकालिक औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन की संभावनाएं धूमिल होने लगती हैं।
योजनाओं का भारी बोझ और
*सीमित राजस्व*
वर्तमान में 'लक्ष्मी भंडार' जैसी महत्वाकांक्षी योजना पर ही सालाना लगभग 40,000 करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है। इसके साथ ही कन्याश्री, रूपश्री और किसान सहायता जैसी योजनाएं खजाने पर अतिरिक्त दबाव बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य का अपना कर राजस्व (Tax Revenue) उस गति से नहीं बढ़ रहा, जिस गति से उधारी बढ़ रही है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के मुकाबले कर्ज का अनुपात 35.38% के आसपास पहुंचना वित्तीय स्थिरता के लिहाज से 'खतरे की घंटी' है।
*औद्योगिक शून्यता और पलायन की चुनौती*
बुनियादी ढांचे में निवेश की कमी और औद्योगिक नीतियों की अनिश्चितता के कारण बड़े निवेशक बंगाल से किनारा कर रहे हैं। बिना नए उद्योगों के राजस्व के नए स्रोत पैदा करना असंभव होता जा रहा है। इसका सीधा असर राज्य के युवाओं पर पड़ रहा है, जिन्हें रोजगार की तलाश में मजबूरन दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। सरकार जहाँ इन योजनाओं को गरीबी घटाने और महिला सशक्तिकरण का जरिया बता रही है, वहीं विपक्ष इसे 'वित्तीय अनुशासनहीनता' और 'वोट की राजनीति' करार दे रहा है।
*भविष्य की राह*
ममता सरकार के लिए आने वाले दिन अग्निपरीक्षा के समान हैं। एक तरफ उन्हें अपनी लोकप्रिय योजनाओं को जारी रखना है, तो दूसरी तरफ बढ़ते कर्ज के बोझ को कम कर उद्योगों के लिए माहौल बनाना है। सवाल केवल आज की 'खैरात' का नहीं है, बल्कि उस आर्थिक नींव का है जिस पर भविष्य का बंगाल खड़ा होगा। संतुलन ही अब बंगाल को इस वित्तीय संकट से उबारने का एकमात्र विकल्प बचा है।
" *अनुभव की स्याही, सरोकार की शक्ति:* खैरात से आज की पेट की आग तो बुझ सकती है, लेकिन कारखानों के बिना कल का चूल्हा जलना मुश्किल होगा। सरोकार अब समाधान की मांग कर रहा है।"
राकेश मिश्रा
स्वतंत्र पत्रकार | उद्यमी | सामाजिक विश्लेषक
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