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30 August 2019

रोजगार दो सरकार...



बेरोजगारों की व्यथा कौन सुनेगा.पुरा देशअभी कश्मीर,राम मंदिर, आरक्षण,हिंदु-मुस्लमान में या तो व्यस्त है या व्यस्त करा दिया गया है.लेकिन जिनकी नौकरियां गयी है और जिन्हें नौकरी मिल ही नही रही, वो शायद व्यस्त नहीं होंगे.उन्हें शिवराज सिंह चौहान और साध्वी प्रज्ञा के नेहरू को अपराधी कहने से कोई फर्क नही पड़ा होगा.नौकरियां जा रही है,लोग परेशान हैं,  लेकिन देश के लिए ये मुद्दा ही नही.अगर मुद्दा होता, तो कुछ तो होता.  देश की अर्थव्यवस्था लगातार ढ़लान पर है.रोटी,कपड़ा और मकान ये 3 बुनियादी जरूरतें होती है.लेकिन इन तीनों से जुड़े सेक्टर की हालत बहुत ज्यादा खराब है. अकेले ऑटोमोबाइल सेक्टर में लाखों नौकरियां जा चुकि है.इस ओर अगर सरकार द्वारा जल्दी कोई कदम नही उठाया गया तो आने वाला वक्त काफी कठनाई ला सकता है.देश की पतली होती अर्थव्यवस्था का कहर लाखों लोगों पर गिर चुका है.मंदी सिर्फ ऑटोमोबाइल सेक्टर में ही नहीं कॉर्टन फिल्ड में भी देखने को मिल रही है. शोरूम में ताले लग रहे हैं.लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं.कोई चार महिनें से बेरोजगार है तो कोई 6महिने से.युवाओं का एक बड़ा वर्ग तो अभी भी अपनी पहली नौकरी पाने के लिए जद्दोजह्द में लगा है.जो नौकरियां है वो तो जा रही है इस हालत में नई नौकरियों की बात करनी तो बेमानी होगी.एक मोटा अनुमान है कि देश से अकेले ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लाखों कामगार फैक्टरियों और शोरूम से बाहर हो गए हैं.ऑटोमोबाइल उद्योग के कच्चा माल लाने ले जाने वाले हजारों ट्रक अपनी जगह खड़े हो चुके हैं.इन बेरोजगारों को समझ नही आ रहा कि देश में अचानक हो क्या गया है. ऑटोमोबाइल के अलावा दूसरे क्षेत्रों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है.देश की सबसे बड़ी बिस्किट निर्माता कम्पनी पार्लेजी बिक्री में भारी गिरावत से परेशान है.पार्लेजी ने सरकार से मांग की है कि 100 रूपये प्रति किलो या इससे कम दाम पर बिकने वाले बिस्किट पर जीएसटी घटाने की बात कही है.कंपनी ने बताया कि सरकार अगर मांग नही मानती तो 10हजार कर्मचारियों की छटनी करनी पर सकती है.
   बाजारों में खरीदारों का कमी बहुत पहले से देखी जा सकती है.रोजर्मरा के समान तक की मांग घटने लगी है.जल्दी-जल्दी बिकने वाले समान जैसे बिस्कुट,डबलरोटी,तेल,साबुन की खपत घटने लगी है.जिसको लेकर FMCGक्षेत्र के उद्यमी चिंता में हैं.देश के ग्रमिण इलाकों में भी इस तरह के सामान की खपत घट गई है. देश की आदी से ज्यादा आबादी वाले ये लोग आज रोजमर्रा का जरूरी सामान भी नही खरीद पा रहे हैं.इस हालत को मंदी का एक कारण भी समझा जा सकता है.
  देश में सबसे ज्यादा पैसा घुमाने वाला क्षेत्र रीयल इस्टेट को माना जाता है.वैसे भी रोटी कपड़े के बाद मकान भी बुनियादी जरूरतों के लिस्ट में शामिल है.पिछले 4-5सालों से इल क्षेत्र की हालत भी बहुत खराब हो चुकि है.जो मकान पहले से बने पड़े हैं वो बिक नही रहे.उसी दौरान नोटबंदी और GSTकी मार ने जरूरतमंदों को शांत कर बिठा दिया. देश की खराब होती अर्थव्यवस्था के कारण बैंकों के फंसे कर्ज का मसला भयाभह रूप ले चुका है. सरकार द्वारा उद्दोगपतियों के कर्ज माफ करने की वजह से बैंक लगातार नुकसान में जा रही है.  पिछले एक साल में इस NPA को सुधारने का दावा किया जा रहा है,लेकिन फॉरेंसिक एकाउंटेसी के नजरिये से इस पर अभी भी गौर नहीं हो लरहा है.NPAमें सुधार का भ्रम पैदा हो रहा है. हाल ही में अर्थव्यवस्था के आकार के लिहाज से अचानक पांचवे से गिरकर सातवें स्थान पर आ गए हैं.चिंता की बात यह है कि तिमाही दर तिमाही आर्थिक वृद्धि कमजोर होती जा रही है.सरकारी तौर पर इस साल देश की GDP7फिसदी से कम का अनुमान है.देश रोजगारविहीन आर्थिक वृद्धि साबित किया जा चुका है.शायद 2014 के बाद पहला मौका है जब उद्दोगपतियों में सुगबुगाहट और सरकार के खिलाफ नाराजगी देखने को मिला. नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार एक कार्यक्रम में बयान दे देते हैं कि 70 सालों में नकदी का अभूतपूर्व संकट बताते हैं. बाद में अपने बयान पर सफाई भी पेश कर देते हैं. उसके बाद आनन-फानन में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण प्रेस कॉन्फेस कर देश की अर्थव्यवस्ता को यूएस और चीन से बेहतर बताते हुए दोनें देशों के ट्रेड वार को इसका जिम्मेदार बताती हैं. सीतारमण ने 70 हजार करोड़ रूपया बैंको को देने के साथ-साथ कई और घोषनाएं भी की. वित्त मंत्री ने बताया की देश में सब ठीक हैं.
देश की सरकार बेरोजगारी के मुद्दे से भागती आई है और अभी भी सही समाधान निकालने में विफल रही है.पिछले साल सांख्यिकी विभाग के लॉकर में बंद आकड़ें उजागर हो गए थे.तब भी सरकार इस मुद्दे की हकीकत को छुपाने में लगी थी.बेरोजगारी, आर्थिक मंदी आज देश के सामने एक भयाभह रूप लेते जा रही है.सरकार कुछ कारगर कदम उठाएगी या पहले की तरह इस मुद्दे से भागती रहेगी.जरूरत है राष्ट्रवाद के खुमारी से निकल कर सरकार इस ओर भी ध्यान दे.नौकरियां जा रही है.बेरोजगार लोगों में आक्रोस बढ़ता जा रहा है.देश की अर्थव्यवस्था पस्त है.देश में सब ठीक है बोल देने मात्र से ही सरकार इस भयंकर स्थिति से ऑख नहीं मूंद सकती.
राहुल झा
प्रबंध संपादक

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