* राजनीति का रमजान
क्या आप रमज़ान में अपने ऑफिस नहीं जाते?, क्या रमज़ान में बच्चे स्कूल नहीं जाते?, क्या मेहनतकश दिन में रोज़े की ही हलात में मज़दूरी नहीं करता?, क्या रिक्शावाला रिक्शा नहीं चलता?, क्या किसान अपने खेत नहीं जाता?, पत्रकारिता से जुड़े लोग रोज़े की हालत में ही दिनभर रिपोर्टिंग करते हैं, और दो-तीन सालों में रमज़ानों में ही जब बोर्ड इम्तहान पड़ेंगे तो आप ये कहेंगे कि बच्चों के एग्ज़ाम भी न हों?, जबकि आपमें से बहोत से लोगों ने ख़ुद बचपन में रामज़ानों में पेपर्स दिए होंगे। जब हम हर ज़रूरी काम करते हैं, तो मुल्क़ के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए, अपनी अहम ज़िम्मेदारी निभाते हुए वोटिंग क्यों नहीं?
रोज़े का असल इम्तेहान भी तो यही है, की रोज़े की हालत में इबादत के साथ-साथ अपने तमाम ज़रूरी काम भी किये जायें। न कि रोज़ा रखकर दिन में सोया जाए! इसलिए बहकावे में न आइये, और बढ़-चढ़कर अपनी ज़िम्मेदारी निभाइये। रमज़ान में मतदान पर मचा घमासान बेहूदा सियासत की अलामत है। मज़हबी रहनुमाओं को भी चाहिए कि वो सियासतदानों के हाथ की कठपुतली न बनें। बात भी वही आके तिलमिला रही है कि रमजान पर रज़ा मंदी होनी चाहिए।क्या कहेंगे आप। यह मेरी व्यक्तिगत राय है।
आशीष तिवारी
संस्थापक संपादक
द फ्रंट न्यूज
