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9 October 2018

शारदीय नवरात्रि कल से प्रारंभ


पंडित सत्य प्रकाश पाण्डेय
जानें कलश स्थापना का मुहूर्त और विधि! पढ़ें 10 अक्टूबर से शुरू होकर 18 अक्टूबर तक चलने वाली शारदीय नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ रूपों के पूजन का महत्व और नौ दिनों तक किये जाने वाले धार्मिक कर्म।
नवरात्रि दो शब्दों की संधि से मिलकर बना शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है नौ रातें। इन रातों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का विशेष महत्व है। इन नौ दिनों में भक्त अपने तप और साधना से देवी दुर्गा की विशेष कृपा व सिद्धियां प्राप्त करता है। नवरात्रि में माँ दुर्गा के जिन नौ रूपों की पूजा की जाती है वे क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघण्टा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। पूजा से पूर्व घटस्थापना कर समस्त देवी-देवताओं और माँ का आह्वान किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक माँ के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

शरद नवरात्रि 2018 घटस्थापना मुहूर्त
घटस्थापना करने का समय 06:18:40 से 07:26:58 तक*
अवधि1 घंटा 8 मिनट

नवदुर्गा की महिमा
दुर्गा दुर्गति नाशिनी, निश्चित रूप से माँ दुर्गा दुर्गति का नाश करने वाली हैं। इस सृष्टि की आदि शक्ति माँ दुर्गा ही हैं। पितामह ब्रह्मा, भगवान विष्णु एव भगवान शिव उन्हीं की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करते हैं।

नवरात्रि पूजा विधि

प्रातःकाल उठें और स्नान करने के बाद पूजा की थाली सजाएँ
माँ दुर्गा की प्रतिमा पर लाल रंग के वस्त्र चढ़ाएँ
मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोयें और नवमी तक प्रतिदिन इनमें पानी डालें
शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित करें। कलश को गंगा जल से भरें, उसके मुख पर आम की पत्तियाँ लगाएं और ऊपर नारियल रखें। कलश से लाल कपड़े को लपेंटे और कलावा के माध्यम से उसे बाँधें। अब इसे मिट्टी के बर्तन के पास रख दें
फूल, कपूर, अगरबत्ती, ज्योति के साथ पंचोपचार पूजा करें
नौ दिनों तक माँ दुर्गा से संबंधित मंत्र का जाप करें और माता का स्वागत कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें
अष्टमी या नवमी को दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन करें और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों (पूड़ी, चना, हलवा) का भोग लगाएं
आखिरी दिन दुर्गा के पूजा के बाद घट विसर्जन करें इसमें माँ की आरती गाएं, उन्हें फूल, चावल चढ़ाएं और बेदी से कलश को उठाएं

नवरात्र में घटस्थापना अथवा कलश स्थापना का विशेष महत्व है। सामान्य रूप से इसे नवरात्रि का पहला दिन माना जाता है। घटस्थापना के दिन से नवरात्रि का प्रारंभ माना जाता है। नवरात्रों (चैत्र व शारदीय) में प्रतिपदा अथवा प्रथमा तिथि को शुभ मुहुर्त में घट स्थापना पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार कलश को भगवान गणेश की संज्ञा दी गई है और किसी पूजा के लिए सर्वप्रथम गणेश जी की वंदना की जाती है।

घटस्थापना के नियम

●  दिन के एक तिहाई हिस्से से पहले घटस्थापना की प्रक्रिया संपन्न कर लेनी चाहिए
●  इसके अलावा कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त को सबसे उत्तम माना गया है
●  घटस्थापना के लिए शुभ नक्षत्र इस प्रकार हैं: पुष्या, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, हस्ता, रेवती, रोहिणी, अश्विनी, मूल, श्रवण, धनिष्ठा और पुनर्वसु

घटस्थापना के लिए आवश्यक सामग्री

●  सप्त धान्य (7 तरह के अनाज)
●  मिट्टी का एक बर्तन जिसका मुँह चौड़ा हो
●  पवित्र स्थान से लायी गयी मिट्टी
●  कलश, गंगाजल (उपलब्ध न हो तो सादा जल)
●  पत्ते (आम या अशोक के)
●  सुपारी
●  जटा वाला नारियल
●  अक्षत (साबुत चावल)
●  लाल वस्त्र
●  पुष्प (फ़ूल)

घटस्थापना विधि
●  सर्वप्रथम मिट्टी के बर्तन में रख कर सप्त धान्य को उसमे रखें
●  अब एक कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग (गर्दन) में कलावा बाँधकर उसे उस मिट्टी के पात्र पर रखें
●  अब कलश के ऊपर अशोक अथवा आम के पत्ते रखें
●  अब नारियल में कलावा लपेट लें
●  इसके उपरान्त नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलश के ऊपर और पल्लव के बीच में रखें
●  घटस्थापना पूर्ण होने के बाद देवी का आह्वान किया जाता है

पूजा संकल्प मंत्र

नवरात्र में 9 दिनों तक व्रत रखने वाले देवी माँ के भक्तों को निम्नलिखित मंत्र के साथ पूजा का संकल्प करना चाहिए।

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे
आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि एतासु नवतिथिषु
अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन् अमुकगोत्रः
अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।

नोट: ध्यान रखें, मंत्र का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। इस मंत्र में कई जगह अमुक शब्द आया है। जैसे- अमुकनामसम्वत्सरे, यहाँ पर आप अमुक की जगह संवत्सर का नाम उच्चारित करेंगे। यदि संवत्सर का नाम सौम्य है तो इसका उच्चारण सौम्यनामसम्वत्सरे होगा। ठीक ऐसे ही अमुकवासरे में उस दिन का नाम, अमुकगोत्रः में अपने गोत्र का नाम और अमुकनामाहं में अपना नाम उच्चारित करें।

यदि नवरात्र के पहले, दूसरे, तीसरे आदि दिनों के लिए उपवास रखा जाए, तब ऐसी स्थिति में ‘एतासु नवतिथिषु’ की जगह उस तिथि के नाम के साथ संकल्प किया जाएगा जिस तिथि को उपवास रखा जा रहा है। जैसे - यदि सातवें दिन का संकल्प करना है, तो मंत्र इस प्रकार होगा:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे,
अमुकनामसम्वत्सरे आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे प्रारभमाणे नवरात्रपर्वणि सप्तम्यां तिथौ
अखिलपापक्षयपूर्वक-श्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये संयमादिनियमान् दृढ़ं पालयन्
अमुकगोत्रः अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः प्रसादाय व्रतं विधास्ये।
ऐसे ही अष्टमी तिथि के लिए सप्तम्यां की जगह अष्टम्यां का उच्चारण होगा।

षोडशोपचार पूजा के लिए संकल्प

यदि नवरात्रि के दौरान षोडशोपचार पूजा करना हो तो नीचे दिए गए मंत्र से प्रतिदिन पूजा का संकल्प करें।

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्राह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसम्वत्सरे
आश्विनशुक्लप्रतिपदे अमुकवासरे नवरात्रपर्वणि अखिलपापक्षयपूर्वकश्रुति-स्मृत्युक्त-पुण्यसमवेत-सर्वसुखोपलब्धये अमुकगोत्रः
अमुकनामाहं भगवत्याः दुर्गायाः षोडशोपचार-पूजनं विधास्ये।

नवरात्रि में अखंड ज्योति
नवरात्रि में अखंड ज्योति का विशेष महत्व है, जिसे प्रज्ज्वलित करने से जीवन से अंधकार दूर हो जाता है। इसलिए नवरात्रि में माता के भक्तों को अपने घरों में अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित करना चाहिए। इससे समस्त बाधाएँ, कष्ट, परेशानियाँ और रोग आदि दूर होते हैं। वेदों में ऋषि-मुनियों ने लिखा है कि अखंड ज्योति का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है।

नवरात्रि में कुमारी पूजन
कुमारी पूजन नवरात्रि व्रत में किया जाने वाला विशेष कर्म है। कुंवारी कन्याएँ जगज्जननी माँ जगदंबा का स्वरूप माना जाता है। इसलिए नवरात्रि में कुमारी पूजन किया जाता है। इसमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार नौ दिन, सात, पांच या तीन दिन तक एक कन्या को देवी स्वरुप मानकर उनका पूजन कर उन्हें भोजन कराना चाहिए।

नवरात्रि में क्या करें
नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना और व्रत रखने वाले जातक को ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए।
उपवास के समय दूध, फल और शाकाहारी भोजन ग्रहण करें। वे व्यक्ति जो सुबह खाली पेट नहीं रह सकते हैं, वे दूध या शर्बत का सेवन कर सकते हैं।
इन नौ दिनों में भूमि शयन यानि जमीन पर सोना चाहिए। इससे शरीर चुस्त रहता है।

नवरात्र में नौ रंग और उनका महत्व

नवरात्रि में हर दिन का एक रंग तय होता है। कहते हैं कि इन रंगों के इस्तेमाल से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

प्रतिपदा के दिन पीला रंग

द्वितीया के दिन हरा रंग

तृतीया के दिन भूरा रंग

चतुर्थी के दिन नारंगी रंग

पंचमी के दिन सफेद रंग

षष्ठी के दिन लाल रंग

सप्तमी के दिन नीला रंग

अष्टमी के दिन गुलाबी रंग

नवमी के दिन बैंगनी रंग

नवरात्रि में आदि शक्ति माँ दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। इन नौ दिनों में माँ अपने भक्तों के दुःख-दर्द और रोगों को दूर करती है और उन्हें सुख-समृद्धि व खुशहाली प्रदान करती हैं।


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