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1 August 2022

हिन्दवी उत्सव की काव्य संध्या-काश वक़्त ठहर जाता!

 



तारीख 30 जुलाई 2022, दिन शनिवार. साहित्य प्रेमियों से खचाखच भरा साहित्य अकादमी का सभागार.  सीटों पर रूमाल, बैग और नोटबुक कुछ यूँ रखे थे मानो कविता वाली इस बस में अपनी जगह आरक्षित रहे, लेकिन ये हो न सका. जिस काव्य प्रेमी ने अपनी जगह छोड़ी, उसकी ‘तौलिया-छेक’ नीति ने दम तोड़ दिया. काव्य की इस संध्या में तिस पर भी व्यवधान नहीं पड़ा, क्योंकि सब साथ होने का सुख साथ-साथ ‘लूट’ रहे थे. कुछ लोग मंच के आगे बिछी दरी पर जा बैठे, कुछ कुर्सियों के पीछे खड़े कवियों को निराहते रहे, कविता का रस लेते रहे.  ये इत्तफ़ाक़ ही था कि मित्र सुदीप्ति के फेसबुकिया आमंत्रण पर नज़र पड़ गई, वरना ये शाम हम (मैं और अभयजी) चूक जाते. 


मंच संचालन सुदीप्ति ने किया और ये वाक़ई मुश्किल साधना रही. मंच पर यूँ तो वक़्त से कहीं ज़्यादा कवि मौजूद थे. दिनेश कुमार शुक्ल की तबीयत थोड़ी नासाज़ बताई गई और इस लिहाज़ से शुरुआत भी उनसे ही की गई. ये भी अच्छा ही रहा, उन्होंने अपने पाठ से वहाँ मौजूद काव्य प्रेमियों की तबीयत ज़रूर हरी-भरी कर दी. इस संध्या को जो ऊर्जा हासिल होनी थी, वो दे गए.  ‘जाग मेरे मन, मछंदर’ का काव्य पाठ ऐसे जादुई अंदाज में किया कि मन जाग उठा. ये पहला मौक़ा था जब दिनेश कुमार शुक्ल को सामने से सुनने का मौक़ा मिल रहा था.


शुरुआत जितनी धमाकेदार अंदाज में हुई, काव्य संध्या का समापन काव्य-आनंद के एक और शिखर पर हुआ। कवि नरेश सक्सेना ने साधिकार 84 की उम्र का हवाला देकर जो ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली, उसे उन्होंने बख़ूबी निभाया भी. ‘चंबल’ जैसी लंबी कविता के पाठ से पहले उन्होंने कुछ ‘छोटी’ (बस आकार में) कविताओं का पाठ किया. वक़्त का ये बंधन मंच पर आसीन कवियों को तो असहज लग ही रहा था, उससे कहीं ज़्यादा कोफ़्त सामने बैठे साहित्य-प्रेमियों को हो रही थी. बीच-बीच में आती पुकार कि हो सके तो वक़्त थोड़ा और बढ़ा दिया जाए. रेख़्ता के कर्ता-धर्ता और हिन्दवी उत्सव के आयोजकों के लिए ये मुमकिन न हो पाया.  



इन दो ध्रुवों के बीच के अंतराल में गगन गिल की कविताओं से गुजरना एक और ‘दुख’ का साक्षात्कार था, वो जितना दुख था, उतना ही सुख भी. किताबों में कवियों से मिलना और बात है, उन्हें अपनी नज़रों के सामने कविता पाठ करते देखना, सुनना और महसूस करना... और बात. समय के बंधन को क़ुबूल करते हुए गगन गिल ने दो-चार कविताओं का पाठ किया, 'अंतर’ तक असर छोड़ गईं. कवियों में सविता सिंह और धीरेंद्र नाथ तिवारी भी इस शाम में शुमार रहे. 


75 के आलोक धन्वा। वही ‘लकलकी’ काया, कोट-पैंट-हैट, और ख़ास देसी अंदाज. मंच संचालिका ने उन्हें हिदायत दे रखी थी कि आप वक्तव्य नहीं देंगे, फिर भी कविताओं के बीच उनका वक्तव्य चलता रहा. उन्होंने ‘घर से भागी हुई लड़कियां’ कविता का पाठ किया.  साल 1999 में हमने दस्तक की काव्य प्रस्तुति ‘आधे-अंधेरे समय में’ पहली बार इस कविता को मंचित किया था.  कई कवियों की रचनाओं से सजी ये प्रस्तुति माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के बाद जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में भी हुई. कविताओं से एक रिश्ता रहा है. साहित्य अकादमी की इस शाम ने इसे और भी समृद्ध कर दिया. 


कोरोना काल में ऐसी शामों का सिलसिला थम सा गया था. कुछ कवियों के जादू का असर था और कुछ इस अंतराल का. कविता पाठ का कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद भी युवाओं ने कवियों को घेरे रखा. बातें करते रहे. ऑटोग्राफ़ लेते रहे. चर्चा होती रही. कवियों और युवाओं के इस सहज रिश्ते के प्रगाढ़ होने का सुख भी अलग ही था. कुछ लोग दूर खड़े इस रसधारा का आनंद बंटोरते रहे. नरेश सक्सेना ने जो कविता गुनगुनाई थी, वो इन तस्वीरों में अपने अर्थ तलाश रही थी. 

 

 शिशु, लोरी के शब्द नहीं 

संगीत समझता है

बाद में सीखेगा भाषा

अभी वह अर्थ समझता है

समझने में उसको, तुम हो

कितने असमर्थ, समझता है

बाद में सीखेगा भाषा

उसी से है, जो है आशा। (नरेश सक्सेना की कविता)

-पशुपति शर्मा, 31 जुलाई 2022

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