
जमा सिंह के पास आधार कार्ड है लेकिन वह उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि उसमें उनकी उम्र 102 साल दर्ज की गई है.
मुनिया देवी कहती हैं कि महीने में 6-7 दिन ऐसे होते हैं, जब पांच लोगों वाले उनके परिवार को खाना नसीब नहीं होता.
31 वर्ष की ये कमज़ोर सी महिला अपने बच्चों के साथ झारखंड के एक सूखे इलाक़े के गांव में रहती है. झारखंड भारत के सबसे ग़रीब सूबों में से एक है. मुनिया के पति भूषण, गांव से क़रीब 65 किलोमीटर दूर स्थित एक ईंट भट्ठे में 130 रुपए की दिहाड़ी पर काम करते हैं.
पिछले तीन साल से मुनिया और भूषण के परिवार को सरकार की तरफ़ से सब्सिडी वाला अनाज नहीं दिया जा रहा. ये अनाज उन्हें भारत की विशाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलता था, जो ऐसे ग़रीबों के लिए लाइफ़ लाइन जैसा है.
ऐसा इसलिए नहीं हो रहा कि सरकार ने इलाक़े की राशन की दुकान को सप्लाई बंद कर दी है. बल्कि इसलिए हो रहा है क्योंकि उनके राशन कार्ड 12 अंकों वाले बायोमीट्रिक पहचान नंबर से नहीं जुड़े हैं.
आज की तारीख़ में एक अरब से ज़्यादा भारतीयों के पास एक ख़ास नंबर है. इसे आधार कहा जाता है. इसका मतलब होता है बुनियाद. आधार योजना एक स्वैच्छिक कार्यक्रम के तौर पर शुरू हुई थी.
इसका मक़सद ग़रीबों को दी जाने वाली मदद में हो रहे फ़र्ज़ीवाड़े को रोकना था. लेकिन अब आधार योजना दुनिया का सबसे महत्वाकांक्षी और विवादित डिजिटल पहचान कार्यक्रम बन चुका है. धीरे-धीरे करके तमाम तरह के वित्तीय लेन-देन और सामाजिक योजनाओं का फ़ायदा लेने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया गया है.

तीन महीने पहले, मुनिया देवी ने 35 किलोमीटर दूर स्थित एक क़स्बे में जाकर फॉर्म और ज़रूरी दस्तावेज़ जमा कराए थे, ताकि उसके परिवार के राशन कार्ड को आधार से जोड़ा जा सके. उस सरकारी दफ़्तर के लोगों ने इसके लिए रिश्वत मांगी, तो मुनिया देवी ने उन्हें अपने काम के लिए 400 रुपए रिश्वत भी दी. ये उसके परिवार की चार दिन की कमाई के बराबर रक़म थी.
मुनिया ने मुझे बताया, 'वो कहते हैं कि नेटवर्क नहीं है. कंप्यूटर काम नहीं कर रहा है और हम अपने परिवार का पेट भरने के लिए अनाज उधार पर उधार ले रहे हैं'.
जिस विशुनबांध गांव में मुनिया रहती है, उसके 282 परिवारों में से ज़्यादातर के पास ज़मीन नहीं है. अच्छे दिनों में उन्हें जो बेहतर खाना मिलता है, वो होता है चावल और आलू और सेम की सब्ज़ी. बुरे दिनों में खाने के लाले रहते हैं.
इस मुश्किल में मुनिया देवी के कई साथी हैं. गांव के 350 सरकारी सब्सिडी पाने वाले लाभार्थियों में से 60 का राशन अधिकारियों ने बंद कर दिया है. वजह वही है. इन सभी के राशन कार्ड तय मियाद में आधार से नहीं जुड़े थे. इनमें से ज़्यादातर की कहानी एक जैसी है. वो बताते हैं कि किस तरह उनका सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटना बार-बार बेमानी साबित होता है.
रिश्वत देने पर भी काम नहीं होता. सरकार ने राशन कार्ड को आधार से जोड़ना कई साल पहले अनिवार्य किया था. अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ इसे ग़रीब विरोधी और ज़बरदस्ती वाला क़दम कहते हैं.