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23 March 2018

हिचकी : फिल्म समीक्षा


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हिचकी की हीरोइन नैना माथुर को टूरेट सिंड्रोम है। ये क्या होता है? जब दिमाग के सारे तार आपस में जुड़ नहीं पाते हैं तो व्यक्ति को लगातार हिचकी आती है। अजीब सी आवाज वह निकालता है। नैना के पिता इससे शर्मिंदगी महसूस करते थे इसलिए नैना उन्हें पसंद नहीं करती है। वह टीचर बनने की कोशिश करती है और 18 बार असफल होने के बाद 19वीं बार चुन ली जाती है।
कक्षा में उसके विद्यार्थी खूब हंसी उड़ाते हैं नैना की हिचकियों की। बस, यहां से टूरेट सिंड्रोम वाला नयापन खत्म हो जाता है और हिचकी की कहानी बेहद रूटीन हो जाती है।

कमजोर तबके के कमजोर विद्यार्थी बनाम अच्छे पढ़ने वाले विद्यार्थी, अच्छा टीचर बनाम बुरा टीचर, कमजोर बच्चों का परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन, आदि-आदि बातें शुरू हो जाती हैं।

फिल्म में अगले पल क्या होने वाला है इस पर कोई इनाम नहीं है क्योंकि सभी को यह बात पता है। नैना के विद्यार्थी हैं, कमजोर हैं, तो परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करेंगे ही।

कहानी के इस बौनेपन को स्क्रीनप्ले भी ऊंचाई नहीं दे पाता। कोई उतार-चढ़ाव नहीं है। सब सपाट। ऐसा लगता है मानो टीवी धारावाहिक चल रहा हो। टूरेट सिंड्रोम का रेशा कहानी और स्क्रीनप्ले में से निकाल दो तो ज्यादा कुछ बचता ही नहीं।

कहानी में नकलीपन भी हावी है। विद्रोही स्वभाव के बच्चे जो किसी टीचर की कुछ नहीं सुनते थे अचानक नैना की सुनने लग जाते हैं। फेल होने वाले बच्चे टॉपर बन जाते हैं। इन बातों के लिए वैसे सीन नहीं रचे गए जो फिल्म को विश्वसनीयता दे। लेखक ने चाहा और हो गया। कैसे हुआ यह सब दर्शाने के लिए मेहनत नहीं की गई। क्लाइमैक्स तक आते-आते फिल्म हांफने लगती है और किसी तरह बात को खत्म किया गया है।

फिल्म का निर्देशन सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने किया है। इमोशनल सीन फिल्माने में वे माहिर लगे। कुछ सीन अच्छे बन पड़े हैं, जो दिल को छूते हैं, जैसे नैना के बचपन के दृश्य, नैना और उसके खान टीचर वाला सीन, नैना द्वारा स्टूडेंट्स को अपना डर दूर करने वाला दृश्य लेकिन अन्य दृश्यों में उनकी पकड़ छूट जाती है। खासतौर पर नैना और उसके पिता के बीच के दृश्य बेहद सतही और बेमतलब के लगते हैं।

फिल्म का अभिनय पक्ष मजबूत है। रानी मुखर्जी की हिचकी बनावटी लग सकती है, लेकिन उनका अभिनय बेहतरीन है। उन्होंने नैना के रोल में अपने को पूरी तरह झोंक दिया है। पहली फ्रेम से ही वे दर्शकों से सीधे जुड़ जाती है और इसी कारण फिल्म से दर्शक बंधे रहते हैं। रानी ने अपने किरदार को बेहद मासूमियत के साथ निभाया है।

नैना के खिलाफ खड़े शिक्षक के रूप में नीरज काबी का अभिनय भी दमदार है। उनके चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज देखने लायक है। सचिन ओवर एक्टिंग करते नजर आए। सभी बच्चों का अभिनय भी नैसर्गिक है। आतिश बने हर्ष मायर का अभिनय उल्लेखनीय है।

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